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1962 भारत- चीन युद्ध के कारण, परिणाम और इतिहास (Indo china war in Hindi)

भारत- चीन मध्य युद्ध, इतिहास, विवाद, नेताओं की भूमिका, पराजय का कारण , परिणाम (1962 indo china war War in Hindi)

1962 indo china war in hindi

हमारे देश भारत की आजादी के बाद ही भारत सरकार की सभी नीतियों में से एक महत्वपूर्ण नीति थी, जिसमें चीन, अमेरिका, रूस इत्यादि सभी देशों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखना था और भारत ही एक ऐसा देश था जिसने सबसे पहले चीन के जनवादी गणराज्य को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दिया था परंतु इन सब का ख्याल ना करते हुए चीन ने सन् 1962 में भारत पर हमला कर दिया। इसे ही भारत-चीन युद्ध कहा गया। इसे 1962 का युद्ध 1962 war के नाम से भी जानते हैं।

भारत- चीन के मध्य युद्ध

सन् 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर भारत के राजनीतिक नेताओं की भ्रांति को चकनाचूर कर दिया। इसके बाद भारत और चीन के मध्य युद्ध 20 अक्टूबर 1962 को आरम्भ हुआ, जिसका अंत 21 नवंबर 1962 को लगभग 1 महीने 1 दिन की अवधि के उपरांत समाप्त हुआ जिसका परिणाम यह हुआ कि इस युद्ध में भारत और चीन के हजारों सैनिकों ने अपना बलिदान दिया और अंततः चीन ने भारत को पराजित कर दिया। इस आक्रमण के दौरान चीन के द्वारा भारत के क्षेत्र अक्साई चीन पर लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर तक अपना कब्जा जमा लिया।सन् 1962 के आक्रमण के उपरान्त भारत ने चीन के विषय में स्वयं की नीतियों में बहुत से बदलाव कर दिये तथा भारत और चीन के संबंधों में एक खटास उत्पन्न हो गई, जो वर्तमान समय तक व्याप्त है।

1962 के भारत- चीन युद्ध का इतिहास

चीन और भारत के मध्य की सीमा विवाद ब्रिटिश साम्राज्य तथा चीन के साम्राज्य से ही विवाद की स्थिति व्याप्त तथा अनिश्चित थी। इन दोनों के मध्य युद्ध की प्रमुख वजह अरुणाचल प्रदेश तथा अक्साई चीन के सीमावर्ती क्षेत्र के अधिराष्ट्र को लेकर था। अक्साई चीन क्षेत्र जिसे भारत अपने लद्दाख का ही क्षेत्र मानता था तथा चीन उसे शिनजियांग का क्षेत्र मानता था, बस यही क्षेत्र भारत और चीन के मध्य टकराव का कारण बना और वह टकराव धीरे-धीरे समय के साथ युद्ध में परिवर्तित हो गया।

सबसे पहले सन 1950 ई. में चीन के द्वारा ऐतिहासिक आधिपत्य का उदाहरण बताते हुए तिब्बत के क्षेत्र पर अपना अधिकार जमा लिया गया तथा इस घटना के बाद भारत द्वारा विरोध रूपी पत्र भेज कर तिब्बत क्षेत्र के मामले पर वार्तालाप का सुझाव रखा गया। फिर भी बाद में सन 1954 में हमारे देश भारत तथा चीन ने मिलकर पंचशील के समझौते के पर हस्ताक्षर कर दिये। इसके बाद तिब्बत क्षेत्र को चीन का क्षेत्र है इसमें सहमति भी भारत ने दे दी। इसी समझौते के दौरान भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने एक नारा भी दिया था जो है “हिंदी-चीनी, भाई-भाई “ है।

सन 1954 ई. को चीन के द्वारा भारत के अक्साई चीन क्षेत्र को आधार बनाकर झिंजियांग से तिब्बत तक मिलाने वाली सड़क निर्माण करवाया, जिसके बारे में जानकारी भारत को सन 1959 में ज्ञात हुआ तथा तभी से भारत और चीन के संबंधों में विवाद उत्पन्न हो गया । 1958 के सितंबर महीने में चीन द्वारा जारी अपने आधिकारिक मानचित्र में भारत के नेफा क्षेत्र (वर्तमान समय में अरुणाचल प्रदेश) तथा लद्दाख के क्षेत्रों को भी शामिल करते हुए दिखाया, जिस पर भारत में चीन द्वारा जारी आधिकारिक मानचित्र की घोर निन्दा की।

1962 में भारत-चीन के मध्य विवाद

सन् 1958 में देश तिब्बत के क्षेत्र में जब चीन के विरुद्ध विद्रोह हुआ तो चीन की सेनाओं ने उस विद्रोह को अपनी शक्तियों से समाप्त कर दिया। इसके उपरांत दलाई लामा स्वंय सहित कुछ अनुयायियों को साथ लेकर सन् 1959 में भारत की शरण में आ गए। दलाई लामा के भारत की शरण में आने पर पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने उनका दिल खोलकर स्वागत किया जिस पर चीन को बेहद गुस्सा आया तथा चीन को यह भी लगा कि तिब्बत के अंदर हुए उसके विरुद्ध विद्रोह में भारत की भी मिलीभगत है। इसी कारण ने भारत चीन युद्ध यानी कि 1962 के युद्ध (1962 war in Hindi) को जन्म दिया।

चीनी प्रीमियर झोउ एनलाइ ने सन 1959 के जनवरी में पहली बार नेफा (वर्तमान के अरुणाचल प्रदेश) तथा लद्दाख के भी क्षेत्र में लगभग 40000 वर्ग मील भारत के क्षेत्र में अपने आधिपत्य को घोषित कर दी । फिर सन 1960 झोउ एनलाइस ने भारत के सामने यह प्रस्ताव रखा कि भारत द्वारा नेफा क्षेत्र (वर्तमान के अरुणाचल प्रदेश) में चीन के आधिपत्य को वापसी करने के बदले अक्साई चीन के क्षेत्र पर अपने अधिकार हटा लें तथा यह स्वीकार कर ले कि अक्साई चीन का क्षेत्र चीन का ही हिस्सा है परंतु उस समय भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी के द्वारा चीन के प्रीमियर झोउ एनलाइस के इस प्रस्ताव को पूरी तरह से ठुकरा दिया।

इन्हीं सब विवादों के कारण चीन ने भारत पर हमला कर दिया तथा भारत को पराजय करते हुये भारत के अक्साई चीन के लगभग 38000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर अपना कब्जा भी जमा लिया।

1962 के युद्ध के समय महत्वपूर्ण नेताओं की भूमिका

1962 में भारत -चीन के युद्ध के समय भारत के प्रधानमंत्री- पंडित जवाहरलाल नेहरू, राष्ट्रपति – डाॅ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन तथा रक्षामंत्री – वी के कृष्णा मेनन थे। वहीं दूसरी ओर 1962 के युद्ध (1962 war in hindi) में चीन की तरफ से चीन के राष्ट्रपति – लियू शाओकि ,चीन के प्रीमियर – झोउ एनलाइ तथा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष – माओ जे़डाॅन्ग की मुख्य भूमिका रही है।

1962 युद्ध में भारत के पराजय का कारण

1962 के भारत चीन युद्ध(Indo china war ) में भारत की पराजय के कुछ मुख्य कारण थे, जो निम्न हैं –

  • इस युद्ध में भारत ने केवल थल सेना का ही उपयोग किया था , वायुसेना और नौसेना का नहीं क्योंकि भारत को डर था अगर वह इन दोनों की मदद लेगा तो चीन भी अपनी वायुसेना और थलसेना की मदद जरूर लेगा ।
  • पराजय का एक कारण भारत सरकार की असावधानी भी थी क्योंकि जवाहरलाल नेहरु जी को लगा कि चीन के द्वारा भारत के उपर कभी हमला नहीं होगा तथा सीमा विवाद को वह बातचीत से सुलझा लेंगे। वे चीन के द्वारा होने वाले छोटे- मोटे विवादों को नजरअंदाज कर गए और अपनी ओर से सैनिकों द्वारा युद्ध की किसी भी प्रकार की कोई तैयारी नहीं की ।
  • इस युद्ध में पराजय का एक मुख्य कारण भारत का युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं होना भी था।
  • किसी भी अंतर्राष्ट्रीय युद्ध में खुफिया एजेंसी की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस युद्ध में भारत की पराजय की वजह खुफिया एजेंसियों की नाकामयाबी भी थी ।

भारत-चीन युद्ध के समय सेना

1962 ईस्वी के युद्ध 1962 war in Hindi के दौरान भारत और चीन के इस युद्ध के समय भारत के साथ लगभग 20,000 से 22000 सैनिक थे तथा इसके विपरीत चीन के साथ लगभग 80,000 सैनिक थे। इसका साफ परिणाम देखने को यह मिला कि भारत, चीन से इस युद्ध में हार गया और जन-धन की अपार क्षति हुई।

भारत -चीन के युद्ध के समय विदेशी सहायता

भारत -चीन के युद्ध में भारत के प्रति कुछ अन्य देशों ने भारत को सहयोग किया। जैसे बात करें अन्य देशों की सहायता एवं योगदान तो सोवियत संघ रूस ने अपने युद्धक विमान उन्नत मिग नामक विमान भारत को बेचकर उसका समर्थन किया । संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी भारत के सेनाओं को गैर-लड़ाकू सहयोग दिया तथा हवाई आक्रमण की प्रस्थिति में भारत का सहयोग करते हुये बंगाल के खाड़ी में अपने विमानवाहक पोत यू.एस.एस किट्टी हाॅक को भेजने का तरीका बनाया।

चीन द्वारा युद्ध को रोकने के लिये एक तरफ़ा घोषणा

1962 के भारत-चीन युद्ध( Indo china war) में भारत के अक्साई चीन के क्षेत्र पर कब्जा जमाने के बाद 21 नवम्बर 1962 को चीन ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी । इस घोषणा को करने के लिए मुख्य कारण थे जो निम्न हैं –

  1. चीन के अपने उद्देश्य जो की लगभग पूरे हो गये थे ।
  2. चीन द्वारा क्षेत्रों के विवाद में अपने शक्ति का प्रदर्शन करना था ।
  3. भारत के द्वारा निकाली गयी भारतीय फ़ाॅरवर्ड पाॅलिसी को रोक दिया ।

(4) चीन को डर था कि कहीं अमेरिका भारत के समर्थन में युद्ध में शामिल न हो जाये।

1962 में भारत-चीन के युद्ध के परिणाम

चीन के सैनिकों की संख्या भारत के सैनिकों से लगभग चार गुणा अधिक थी। इसके परिणाम स्वरूप भारत को इस युद्ध में पराजय का का मुँह देखना पड़ा । भारतीय स्रोत के आधार पर इस आक्रमण में भारतीय सेना के लगभग 1383 जवान शहीद हो गए, 1696 जवान लापता हो गये, 548 – 1047 के लगभग जवान घायल हुए। वहीं 4,000 जवान युद्ध के दौरान चीन के द्वारा बंदी बन गए थे जबकि चीनी स्रोत के अनुसार चीनी सेना के लगभग 722 व्यक्ति मारे गए तथा लगभग 1697 व्यक्ति घायल हुये । 1962 के युद्ध (1962 indo china war ) का परिणाम वाकई काफी भयावह था जिसका भयानक परिणाम दोनों देशों को भुगतना पड़ा।

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Q:- भारत और चीन के बीच युद्ध कब हुई थी?

Ans: भारत और चीन के बीच युद्ध 2 अक्टूबर 1962 से 21 नवंबर 1962 तक हुई।

Q:-1962 के युद्ध में मरने वाले कुल भारतीय सैनिकों की संख्या कितनी थी?

Ans: 1962 के युद्ध में मरने वाले कुल भारतीय सैनिकों की संख्या 1300 थी।

Q:- 1962 के युद्ध में चीन के कुल मरने वाले सैनिकों की संख्या क्या थी?

Ans: 1962 के युद्ध में चीन के कुल मरने वाले सैनिकों की संख्या 45 थी।

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Shambhavi Mishra

यह कानपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी हैं। इन्होंने हिंदी साहित्य में परास्नातक किया हुआ है। इन्हें शिक्षा, बिज़नस से संबंधित विषयों पर काफी अनुभव है और इन्ही विषयों पर लेख लिखती है। Follow Her On Facebook - Click Here

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