Skip to content

स्वामी विवेकानंद के जीवनी | Biography Of Swami Vivekananda In Hindi

स्वामी विवेकानंद के जीवनी, जन्म, प्रारंभिक जीवन, चरित्र , गुरु भक्ति,शिक्षा पर विचार, धर्म , महत्वपूर्ण कार्य, स्वामी विवेकानंद के 9 अनमोल वचन | Biography Of Swami Vivekananda , Birth, Preliminary, Thoughts on life characteristics, Work on education, Mission work, 9 priceless words of Swami Vivekananda

Swami Vivekanandan

स्वामी विवेकानंद वेदांत के काफी प्रभावशाली एवं विख्यात गुरु थे। उन्होंने 1893 ईस्वी में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में भारत देश की तरफ से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का वेदांत विदेश के देशों जैसे अमेरिका यूरोप आदि सभी देशों में स्वामी विवेकानंद के कारण ही पहुंच पाया था। उनके तरह के चरित्र एवं व्यक्तित्व का आज के समय में मिलना असंभव कार्य से कम नहीं है।

विवेकानंद केवल संत ही नहीं बल्कि वक्ता, विचारक, लेखक, महान देशभक्त और एक मानव प्रेमी भी थे। देशवासियों का आवाह्न करते हुए उन्होंने हर छोटे से छोटे और बड़े से बड़े क्षेत्र से लोगों को निकल कर भारत की आजादी प्राप्त करने के लिए लड़ाई जारी लड़ाई में शामिल होने के लिए कहा। इसके बाद पूरी जनता ने उनके पुकार का उत्तर भी दिया और वे सभी गर्व के साथ निकल गए। गांधी जी को भारत आजादी की लड़ाई में जो समर्थन प्राप्त हुआ वह सब विवेकानंद के आह्वान का ही एक परिणाम था। 

उनका इस बात पर विश्वास था कि भारतवर्ष धर्म और दर्शन की पुण्यभूमि है। बड़े बड़े ऋषि और एवं महात्माओं का जन्म यहीं हुआ, यही त्याग एवं सन्यास की भूमि है एवं केवल यहीं पर आदिकाल से मनुष्य के जीवन के लिए सर्वोच्च मुक्ति एवं आदर्श का द्वार खुला हुआ है। विवेकानंद का यह कथन था —‘‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक रुको नहीं जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।’’

स्वामी विवेकानंद का जन्म

स्वामी विवेकानंद का जन्म कोलकाता में 12 जनवरी सन् 1863 ईस्वी में हुआ था। इन के बचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। स्वामी विवेकानंद के पिता श्री विश्वनाथ दत्त थे जो कोलकाता हाई कोर्ट में एक प्रसिद्ध वकील थे। इनके पिता पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास करते थे। इसके अलावा वे अपने पुत्र नरेंद्र नाथ को भी अंग्रेजी पढ़ा कर पाश्चात्य सभ्यता के रास्ते पर ही चलाना चाहते थे। इनकी माता का नाम श्रीमती भुवनेश्वरी देवी जी था जो धार्मिक विचारों वाली महिला थी। इनकी माता का ज्यादातर समय भगवान शिव की पूजा अर्चना में व्यतीत होता था।

स्वामी विवेकानंद का प्रारंभिक जीवन

स्वामी विवेकानंद बचपन से ही बुद्धि में अत्यधिक तेज एवं नटखट थे। वह अपने साथियों के साथ तो शरारत करते थे साथ ही वे अपने अध्यापकों को भी परेशान करते हैं। उनके घर पर रोजाना नियम पूर्वक पूजा-पाठ हुआ करता था। उनके माता का धार्मिक प्रवृति के होने के कारण उन्हें रामायण, महाभारत, पुराण आदि की कथा सुनने का शौक था। उनके घर पर हमेशा कथावाचक आते जाते रहते थे। बचपन से ही नरेंद्र के मन में उनके परिवार में आध्यात्मिक एवं धार्मिक वातावरण होने के कारण धर्म और अध्यात्म के संस्कार गहरे पड़ने लगे थे। बचपन में ही उनके मन में ईश्वर को प्राप्त करने की इच्छा दिखाई पड़ गई थी।

स्वामी विवेकानंद का चरित्र

नरेंद्र के पिता विश्वनाथ दत्त की देव योग के वजह से मृत्यु हो गई। घर का संपूर्ण भार अब नरेंद्र पर आ गया था । घर की दशा इतनी खराब होने एवं दरिद्रता में होने के बावजूद भी नरेंद्र नाथ अतिथि सेवी थे। नरेंद्र स्वयं भूखे रहकर एवं बाहर बारिश में रातभर भीगते ठिठुरते हुए रहकर घर आए अतिथि को भोजन करवाते एवं अपना बिस्तर सोने के लिए देते थे। वे स्वयं को हमेशा गरीबों का सेवक कहा करते थे। उन्होंने भारत के गौरव को सदा उज्जवल करने का प्रयत्न किया था। वे जब भी किसी देश में जाते थे तब वहां के लोग उनसे काफी प्रसन्न होते थे। स्वामी विवेकानंद प्रतिदिन दिन में केवल 2 घंटे सोते थे एवं प्रत्येक 4 घंटे के बाद 15 मिनट के लिए एक झपकी ले लिया करते थे।

स्वामी विवेकानंद के गुरु

विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस के सबसे प्रिय शिष्य थे। रामकृष्ण परमहंस को मुख्य रूप से उनके भाषण के लिए जिसमें हमेशा उनका शुरुआती शब्द “मेरे अमेरिकी भाइयों एवं बहनों” के साथ अपने भाषण की शुरुआत करने के लिए जाना जाता है, उनसे ही स्वामी जी ने यह सीखा था। शिकागो सम्मेलन में उनके इस संबोधन के प्रथम वाक्य ने सभी लोगों का मन जीत लिया था। स्वामी विवेकानंद अपना संपूर्ण जीवन अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर दिए थे। अपने गुरुदेव के शरीर त्याग के समय में अपने घर परिवार, भोजन, वस्त्र आदि की चिंता किए बिना केवल अपने गुरु की सेवा में संलग्न रहे।

स्वामी विवेकानंद के गुरु भक्ति

गुरुदेव की सेवा में एक बार किसी शिष्य ने घृणा दिखाई थी यह देख कर विवेकानंद को बहुत क्रोध आया था। विवेकानंद ने अपने गुरु भाई को गुरुदेव जी की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए एवं उसे पाठ पढ़ाते हुए बिस्तर के पास कफ और रक्त आदि से भरी थूकदानी उठाकर फेंक दी थी। अपने गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा के प्रताप से ही वे उनके दिव्यता आदर्शों की एवं अपने गुरु के शरीर की उत्तम सेवा कर पाए। स्वामी विवेकानंद चाहते थे कि वे अपने गुरु को समझ सकें, स्वयं को गुरु में विलीन कर सकें एवं भारत के अमूल्य आध्यात्मिक भंडार के पूरे विश्व में महक फैला सकें। स्वामी विवेकानंद की गुरु भक्ति एवं गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा ऐसी ही थी।

स्वामी विवेकानन्द का योगदान तथा महत्व

स्वामी विवेकानंद ने 39 वर्ष की उम्र में ही जो कार्य किया, वह सदैव आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करेगी। स्वामी विवेकानंद ने मात्र 30 वर्ष की उम्र में अमेरिका के शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्हें सार्वभौमिक पहचान दिलवाई। रविंद्र नाथ टैगोर ने विवेकानंद के बारे में कहा था – “यदि आप सभी भारत को जानना चाहते हैं तो इसके लिए विवेकानंद को पढ़िए, आप उनमें सब कुछ केवल सकारात्मक ही पाएंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।”

रोमा रोला ने स्वामी विवेकानंद के बारे में कहा था – ‘‘उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है वह जिस जगह पर गए सर्वप्रथम हुए। सभी कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता है। ईश्वर के प्रतिनिधित्व थे एवं सब कुछ प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। एक बार हिमालय प्रदेश में एक अनजान यात्री उन्हें देखकर ठिठक कर रुक गया एवं आश्चर्य पूर्वक चिल्ला उठा, शिव! यह सब ऐसा हुआ कि मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव शिव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।’’

स्वामी विवेकानन्द का शिक्षा-दर्शन

स्वामी विवेकानंद अपने समय में प्रचलित अंग्रेजी शिक्षा के विरोधी थे। वे एक ऐसी शिक्षा चाहते थे जिससे किसी बच्चे का सर्वांगीण विकास हो पाए। किसी बालक की शिक्षा का उद्देश्य उसको केवल आत्मनिर्भर बनाना है। विवेकानंद ने प्रचलित शिक्षा को नकारते हुए कहा है कि आप उस व्यक्ति को शिक्षित मानते हैं जिन्होंने कुछ परीक्षाएं पास कर ली है परंतु जो शिक्षा जनसाधारण को जीवन के संघर्ष के लिए तैयार ना करें या जिससे चरित्र निर्माण ना हो, जो समाज सेवा की भावना को उजागर ना करें तथा जो एक शेर की तरह साहब पैदा ना कर सके, ऐसी शिक्षा से कोई लाभ नहीं है।

स्वामी विवेकानंद शिक्षा द्वारा पारलौकिक एवं अलौकिक दोनों तरह के जीवन को बनाना चाहते हैं। लौकिक से तात्पर्य हमें एक ऐसी शिक्षा चाहिए, जिससे हमारे मन का बल मजबूत हो, हमारे चरित्र का गठन हो, व्यक्ति स्वावलंबी बने एवं हमारे बुद्धि का विकास हो सके। पारलौकिक से तात्पर्य किसी भी मनुष्य की शिक्षा अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति होती है।

शिक्षा का सही अर्थ उचित आचरण, तकनीकी दक्षता, विद्या, शिक्षा ज्ञान आदि को प्राप्त करने की प्रक्रिया होती है। शिक्षा शब्द का अर्थ सीखने एवं सिखाने की क्रिया होती है। स्वामी जी के विचार में शिक्षा का प्रसार खेल के मैदानों और खेतों , कारखानों , यहां तक की देश के सभी घरों में होना चाहिए। जैसे कि यदि बच्चे स्कूल तक नहीं पहुंच सकते हैं तो शिक्षकों को बच्चों तक पहुंचना चाहिए। स्वामी जी का जीवन हमें यह बताता है कि स्वयं पर सदैव अटूट विश्वास करें एवं सभी लोगों को अपनी आत्मा का ही स्वरूप समझें।

स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन के सिद्धान्त

स्वामी जी के कुछ मूल सिद्धांत निम्नलिखित हैं –

  1. शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे किसी बालक का मानसिक और शारीरिक विकास हो पाए।
  2. शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिससे हमारा मन मजबूत हो, हमारे चरित्र का सही गठन हो और हम स्वावलंबी बनें। इसके साथ ही हमारे बुद्धि का विकास हो सके। 
  3. बालक और बालिकाओं दोनों को समान शिक्षा प्राप्त हो।

स्वामी विवेकानंद की यात्राएँ

नरेंद्र यानी कि स्वामी विवेकानंद जी ने मात्र 25 वर्ष की अवस्था में ही गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया था। उन्होंने पूरे भारतवर्ष की यात्रा पैदल ही की थी। 1893 में अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन हुआ था। विवेकानंद उस सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधित्व के रूप में पहुंचे थे।

अमेरिका एवं यूरोप के सभी लोग भारत वासियों को घृणा की दृष्टि से देखते थे। उस सम्मेलन में लोगों का यह प्रयत्न रहा कि वे स्वामी विवेकानंद को बोलने का अवसर न दें। एक अमेरिकन प्रोफेसर की मदद से विवेकानंद को बोलने का अवसर मिला। उनके विचारों को सुनकर सभी लोग एवं विद्वान चकित रह गए। उसके बाद अमेरिका में उनका काफी स्वागत हुआ। 

इसके बाद विवेकानंद के भक्तों का वहां एक बड़ा समुदाय बन गया। विवेकानंद 3 वर्षों तक अमेरिका में ही रहे और वहां के लोगों को भारतीय धर्म के प्रति अद्भुत ज्योति देते रहे। वहां की मीडिया ने उनके ज्ञान को देखते हुए उन्हें ‘साइक्लॉनिक हिन्दू’ नाम दिया। स्वामी विवेकानंद जी का यह दृढ़ विश्वास था कि भारतीय दर्शन एवं आध्यात्मिक विद्या के बिना संपूर्ण विश्व नष्ट हो जाएगा। 

स्वामी जी ने रामकृष्ण मिशन की कई सारी शाखाएं अमेरिका में स्थापित की। 

स्वामी विवेकानंद का शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन

स्वामी विवेकानंद 11 सितम्बर 1893 को अमेरिका स्थित शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। स्वामी जी ने जैसे ही विश्व धर्म सम्मेलन में अपनी ओजस्वी वाणी से “मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों” से अपने भाषण की शुरुआत की वैसे ही पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। उसके बाद अपने भाषण में स्वामी जी ने भारतीय सनातन वैदिक संस्कृति के विषय में स्वयं के विचार प्रकट किए। उनके विचारों से ना केवल अमेरिका में अपितु पूरे विश्व भर में स्वामी जी का सम्मान होने लगा।

विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी जी का दिया गया भाषण आज भी इतिहास के पन्नों में अमर है। स्वामी जी विश्व धर्म सम्मेलन के बाद 3 वर्ष तक ब्रिटेन एवं अमेरिका में वेदांत के शिक्षा का प्रचार कर रहे थे। स्वामी जी 15 अगस्त 1897 में श्रीलंका पहुंचे, जहां पर उनका जोरदार स्वागत किया गया।

स्वामी विवेकानंद के महत्वपूर्ण कार्य

इसके साथ उनके अंदर परमात्मा को पाने की भी प्रबल इच्छा थी। इसी वजह से सबसे पहले वह ब्रह्म समाज में शामिल हुए परंतु वहां भी उन्हें संतोष प्राप्त नहीं हो पाया। उन्होंने वेदांत एवं योग को पश्चिमी संस्कृति में प्रचलित करने के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। स्वामी विवेकानंद द्वारा रामकृष्ण मिशन की स्थापना का प्रभाव आज भी हमें देखने को मिल रहा है जो काफी विस्तृत होकर अपने कार्य में संलग्न है।

स्वामी विवेकानंद ने एक ऐसे नए समाज की कल्पना की थी जिसमें केवल धर्म एवं जाति के आधार पर किसी भी मनुष्य के बीच कोई भेद ना रहे। वेदांत के सिद्धांतों को भी उन्होंने इसी रूप में रखा था। आध्यात्मिक एवं भौतिक वाद विवाद में जाए बिना भी यह कहा जाता है कि विवेकानंद ने समता के सिद्धांत का जो आधार दिया शायद ही उससे सबल आधार ढूंढा जा सकता है। 

स्वामी विवेकानंद को युवकों से काफी आशाएं थी। आज के समय के युवकों के लिए स्वामी विवेकानंद के जीवन वृत्त का यह लेखन उनके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं समकालीन समाज के संदर्भ में उपस्थित करने का प्रयास किया गया है जिससे उनके मानवीय रूप एवं सामाजिक दर्शन पर पूरा प्रकाश पड़े।

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु

विवेकानंद के आजा श्री और सारगर्भित व्याख्यान की प्रसिद्धि पूरे विश्व भर में फैली है। अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की। अंतिम समय में भी उन्होंने अपने ध्यान करने की दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं किया। 

स्वामी जी को शर्करा एवं दमा के अतिरिक्त अन्य बीमारियों ने भी घेर रखा था। विवेकानंद ने यह तक कह दिया था कि यह बीमारियां मुझे 40 वर्ष भी पार नहीं करने देगी। बेलूर के रामकृष्ण मठ में 4 जुलाई 1902 को विवेकानंद ने ध्यान मग्न अवस्था में ही समाधि धारण करके अपने प्राण त्याग दिए। विवेकानंद के अनुयायियों एवं शिष्य ने उनकी स्मृति के रूप में वहां एक मंदिर की स्थापना की एवं पूरे विश्व में विवेकानंद एवं उनके परम गुरु रामकृष्ण परमहंस के संदेशों का प्रचार करने के लिए 130 से भी अधिक केंद्रों की स्थापना करवाई, जिसकी आज भी काफी मान्यता है।

यह भी पढ़े:

FAQ :

Q.स्वामी विवेकानंद का जन्म कब और कहां हुआ था?

Ans: स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी सन् 1863 ईस्वी में कोलकाता में हुआ था।

Q.स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम क्या था?

Ans: स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था।

Q.स्वामी विवेकानंद के गुरु कौन थे?

Ans: स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस जी थे।

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु कैसे हुई?

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु शर्करा और दमा की बीमारी के कारण हुई।

nv-author-image

Shambhavi Mishra

यह कानपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी हैं। इन्होंने हिंदी साहित्य में परास्नातक किया हुआ है। इन्हें शिक्षा, बिज़नस से संबंधित विषयों पर काफी अनुभव है और इन्ही विषयों पर लेख लिखती है। Follow Her On Facebook - Click Here

Leave a Reply

Your email address will not be published.